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#Hindi
virtualciti · a minute ago
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कल उसके साथ है, लोग जिसके साथ हैं KAL USKE SATH HAI, LOG JISKE SATH HAIN Tomorrow is with the one people are with. #tomorrow #leader #leadership #leaderquotes #leadershipshipquotes #hindiquote #hindiquotes #hindi #हिंदी #हिंदीकोट्स #mindsetcoach #mindcoach #executivecoach #lifecoach #lifequotes #lifeskills #artofliving #quote #quotes #motivationalquotes #inspirationalquotes #bestquotes #depressed #depression #overthinking (at Chandigarh, India) https://www.instagram.com/p/CNg13i9j0s1/?igshid=17fpubadbvztv
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moralfoundation · an hour ago
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“मैं रक चुका हूँ।”
आज हम उन भावनाओं और दवचारों का उपवास कर रहे हैं जो कहते हैं, “्ैं थक िुका हूँ!” इस संसार में आप जो कु छ भी िेखते हैं वह परमेश्वर द्ारा छह दिनों में बनाया गया रा। वह बहुत कम समय में बहुत कु छ करने में सषिम है। और वह आप में रहता है! आपको अपना बोझ अके ले नहीं उिाना पड़ेगा। अदिकांर लोगों को यह समझ में नहीं आया दक यीरु के कहने का क्या अर्त रा, जब उसने कहा, “मेरा जूआ अपने ऊपर उिा लो।” जूआ िो बैलों पर…
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krrishnaofficial · an hour ago
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🍁|| "Jaan leni thi saaf keh dete,
Kya zarurat thi muskuraane ki." ||🍁
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kaminimohan · 15 hours ago
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काव्यस्यात्मा 719
गुरुत्वाकर्षण के भार को कौन रोक सका यहाँ?
वसंत, फाल्गुन, चैत को आने से कौन रोक सका यहाँ?
परित्यक्त रहता हूँ बदलते मौसम में,
मखमली सोच-विचार के उलझते मौसम में।
सूरज निकलता है,
हवाओं को गरम करता है।
हम कितना भी कानाफूसी करें,
वह चलता ही रहता कुछ भी न सुनता है।
कला की काॅपी में बच्चे की पेंटिंग से,
बर्फ़ फिसलता-लटकता है।
अँधेरी खिड़की से ताकता पहाड़,
खिड़की तक कभी न पहुँचता है।
सूखे काग़ज़ पर रंगों की भीड़,
सही के निशान की एक लालिमा को तरसता है।
हाथ बांधे खड़े बच्चे के मानस में उमड़ता मौसम,
सुबह से पेड़ पर पड़ते धूप-सा बदलता है।
बना लो चाहे रात-दिवस,
बदलते मौसम की तस्वीरें।
बदल देगा वक्त का मौसम,
हर चित्रकार की तस्वीरें।
क्‍यों भूलते हो?
आसानी से ख़राब हो जाते मौसम को।
सफल होते है वही,
जो मौसम-ए-बहार को पुकार लाए।
जो उलझे है अज़ाब में उन्हें सँवार लाए।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय
-काव्यस्यात्मा
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kaminimohan · 15 hours ago
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काव्यस्यात्मा 718
// सोने या चाँदी की नहीं //
सोने या चाँदी की नहीं,
उन्‍हें जरूरत पड़ेगी रोटियों की।
युद्ध के मैदानों में थके किसानों के,
रक्त से उपजने की।
बड़े महलों की बड़ी रोटियों से पूछो,
नाम महल का या रोटी का होगा।
फटे बम-बारुद के टुकड़ों पर
मुकुट किसके नाम सजेगा।
ज़िंदगी पर भूख की लगाम लगाने को,
बराबर संख्या में बंटती रोटी का दुकान सजेगा।
राज करने के लिए,
भाग्‍य लिखने के लिए,
रोटी की कीमत पर ईमान बिकेगा।
सोने के सिक्‍कों देखो,
रोटी तुम्‍हारा मुखड़ा कुरेदने आ रही है।
और वहाँ,
जहाँ पेट के रस की पूर्ति
फीकी नहीं लगती,
जहाँ हवाओं में रोटी की गंध नशीली नहीं लगती।
मांस का गंध है तैरती;
चलता है रोटियों का व्‍यापार
मांस की कीमत बाजार है बनती।
अब मैं,
खेत को खरोंचूँगा और चूमूँगा,
कहूँगा दे दो रोटी।
क्यूँ छुपाया है अंधकार में,
हमारे देह जिससे बनता इस संसार में।
सुनों! भूल रहे तुम
माता भूमि पुत्रोहं पृथिव्या,
तुम कब से सेक रहे चाँद पर रोटियाँ।
तुम नहीं देख रहे हिरण्मयी मिट्टी को
मत मांगों महलों से रोटी;
जब धरती माँ दे रही हर तन को रोटी।
मांग कर रोटी मत करो तिरस्कार,
ये तुम्हारे देह का है पहला प्‍यार।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय
-काव्यस्यात्मा
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#काव्यस्यात्मा
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kaminimohan · 15 hours ago
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काव्यस्यात्मा 717
// प्रेम वो धुन हैं //
प्रेम वो धुन हैं सुने तो पिघलती है समंदर के सीने पर जमी बर्फ़,
सदियों से कृष्ण के अफ़्साने अश्रु-लहरों पर हो रही सतत् सर्फ़।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय
-काव्यस्यात्मा (शब्दार्थ:-)
सतत्- लगातारी, continuous
सर्फ़ : अपव्यय, व्यय Expenditures,
#kaminimohan
#काव्यस्यात्मा
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kaminimohan · 15 hours ago
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काव्यस्यात्मा 716
फूलों और तारों का चिह्न आँखें देह की,
हवा का स्पर्श झुर्रियाँ लहरों की।
सुबह की रोशनी है कसमसाती,
जब खोखली दीवारें फीकी हो जाती।
जब गहराई में उतर आसमान,
धरती में दफन हो जाती।
सब अदृश्य ज्वार ओढ़ते कफ़न,
खोखली फूलझड़ियाँ दृश्य बनाती।
श्मशान में रौशन चिता,
क्षेत्रज्ञ की ज्वालाएँ निर्मित करती।
छितराया धुंआ, वाष्पित रक्त
सूर्यत्व से मिलन है करती।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय
-काव्यस्यात्मा
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kaminimohan · 15 hours ago
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काव्यस्यात्मा 715
यहाँ बड़ी-बड़ी बातें करते हैं सब,
भविष्य के सपने बुनते हैं सब।
जो है उसे लक्ष्य से जोड़ते-तोड़ते हैं,
मन को स्वर्गिक सुख तक भेजते हैं।
हो जाए जर्जर देह,
फिर भी आशा करते हैं।
चिर युवा रहने की,
सुख की कामना करते है सब।
भ्रम नहीं है कोई;
है अंतरात्मा की आवाज़,
उत्कट मनुहार भरा साज़।
क्योंकि हम हुए हैं पैदा,
एक उद्देश्य के लिए।
अंतरात्मा प्रज्ज्वलित हो जिस क्षेत्र में,
उस उद्भूत प्रकृति-प्रखण्ड के लिए।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय
-काव्यस्यात्मा
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kaminimohan · 15 hours ago
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काव्यस्यात्मा 714
एक दिन मिट्टी का ये कलश टूट जाएगा,
हे ईश्वर! तुम्हारा पेय हूंँ, सब बिखर जाएगा।
क्या ख़ुद को अनावृत कर यूँ ही चल दोगे तुम?
देखो! रेत-सा बिखरा हूँ, समेटा न जाएगा।
प्रेम-करुणा की गागर भर-भर कर लाता रहूँगा,
नौ रसों से तुमको रोज़ नहलाता रहूँगा।
सोच लो !, तुम भी, गागर जो तूने तोड़ी ये
तुम्हारे बग़ैर युगों तक मैं धूल फाँकता रहूँगा।
पंचतत्व का फिर कोई कार्य न रह जाएगा,
घर तुम्हारा ही न रहा तो अर्थ क्या रह जाएगा?
गागर जो तूने तोड़ी, मैं पड़ा रह जाऊँगा,
तुम्हारे आत्म तन का दिव्य मंदिर टूट कर गिर जाएगा।
देह में रहे तुम, परिवार से मिले तुम,
तुम्हें भजने वाला कंठ न रह जाएगा।
प्यार की दौलत जो तुम पर लुटाई हमने,
बताओ "मोहन" फिर उसका मोल क्या रह जाएगा?
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-© कामिनी मोहन पाण्डेय
- काव्यस्यात्मा
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#काव्यस्यात्मा
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kaminimohan · 15 hours ago
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काव्यस्यात्मा 713
"दोहा"
जब खेले खिलौनों से, खिलौना जाए टूट।
जीवन साँसों का खेल, खेलो जितनी छूट।।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय
-काव्यस्यात्मा
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kaminimohan · 15 hours ago
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काव्यस्यात्मा 712
क्या है ज्ञात ? क्या है अज्ञात ?
नहीं कुछ जानता हूँ ,
मैं राही हूँ ;
कि जिसकी छाह लेकर
हर राह सुकून पाती है।
पर, नहीं ठहरती ज़िंदगी
चलती धूप में
हर छाह सरकती जाती है।
जिस राह पर है चलना
वो कभी पास तो कभी दूर चलती जाती है।
क्या है ज्ञात ? क्या है अज्ञात ?
राहें भला कब बताती है।
हर साँस की गति पर चलता जाता हूँ,
ब्रह्म रहता इस देह में
नहीं कुछ जान पाता हूँ ;
उसका पता चले इस उम्मीद में
बस एक क़दम और मानकर
चलता जाता हूँ?
-© कामिनी मोहन पाण्डेय
- काव्यस्यात्मा
#kaminimohan
#काव्यस्यात्मा
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kaminimohan · 16 hours ago
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काव्यस्यात्मा 711
मन के वातायन में आशा के दीप जले,
सब विषादों की पीड़ा से चलो दूर चले।
अंतर्घट में रहता जब तक अनजाना संवाद,
बेहिसाब, असरहीन झांकता अवसाद।
संबंधों की मीमांसा में सवेरा बांध लो,
आशाओं के मोती हाथों में थाम लो।
उठो प्रिय फिर क़दम बढ़ाओं,
मन की उजली रेत पर फूल सा बिछ जाओ।
छोड़ों संवाद, सजाओं सूरज का ताप।
जला दो बेवजह खड़े प्रलाप।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय
-काव्यस्यात्मा
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#काव्यस्यात्मा
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kaminimohan · 16 hours ago
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काव्यस्यात्मा 710
धरा पर पूर्णात पूर्ण पल्लवित यह शिक्षा हैं,
क़दम रख जिस पर हम चलते यह शिक्षा है ?
आँख जो देखती है हृदय जो बोलती उस प्रेम का पूर्णत्व है इनमें,
सदा प्रकाशित पाथेय नवसृजन का पुलकित यह शिक्षा है।
शिक्षा क्या है? देख सकते हो?
कोमल पाँव जो चढ़े विद्या-मंदिर देख सकते हो ?
साधना के स्वर की गूँजती है हर मानस में निरंतर ध्वनि,
निर्झर ज्ञान-वाटिका का खिला नव-पुष्प देख सकते हो?
गुरुतर शिक्षा का स्पर्श जिस पर जीवन पलता है,
कम्पन होता सदा जब मूक अश्रु ढल कर कपोल पर बोलता है।
इसलिए, देखो शिक्षा कहाँ-कहाँ है वास करता?
शिष्यत्व? अरे, यह दिव्य प्राणी-संसार रचता है।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय
-काव्यस्यात्मा
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kaminimohan · 16 hours ago
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काव्यस्यात्मा 709
"प्रस्ताव" / - कामिनी मोहन पाण्डेय
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"विश्वास करो, मेरा प्रस्ताव कोई खेल नहीं है।"
"कैसा प्रस्ताव? "
"कहो!"
"तुम ठुकराओगे तो नहीं?"
इतना सुनकर अग्निभूति को देवमति सतत प्रवाहमयी धारा-सी दिखने लगी।
अग्निभूति भी बोल पड़ा।
मैं तुमसे प्रेम करता हूँ, " क्या तुम मुझसे प्रेम नहीं करतीं? "
देवमति झट से बोल पड़ी, "कई बार प्रेम पुरुष के लिए एक संपदा, अहंकार को पुष्टि, मनरंजन व खेल है पर स्त्री के लिए शाश्वत संकल्प !"
"शाश्वत संकल्प से क्या तात्पर्य है तुम्हारा", अग्निभूति ने पूछा,
देवमति ने कहा, "सारा खेल, अहंकार और मनरंजन केवल शरीर तक है, जबकि संकल्प मन और आत्मा दोनों को अपने घेरे में बांध लेता है।" यह सारे विकल्पों से परे हैं।
... यह सुन अग्निभूति की आँखें जैसे पत्थर-सी ठहर गईं। इस पर देवमति ने पूछा, "अग्निभूति तुम क्या देख रहे हो।"
सुनो! "शरीर की प्रकृति वासना का सारा साधन उत्पन्न करती हैं, लेकिन आत्मा नहीं।"
"तुम विश्वास करो, मेरा प्रेम वासनायुक्त नहीं है।" अग्निभूति ने सहजता से उसकी आँखों में देखते हुए कहा।
"नहीं, तुम झूठ बोलते हो "दो दिलों के प्रेम में सच और झूठ नहीं होता।" "देह और आत्मा का विकल्प नहीं होता।"
देवमति ने स्पष्ट कर दिया कि, "प्रेम में विवेक नहीं होता।" जीवन में विवेक के कारण ही सत्य और झूठ दिखता है।
देखो! "प्रेम विवेक की सीमा से परे है, यह असीम समर्पण का अमिट संसार है।"
देवमति के तर्क और समझदारी के आगे अग्निभूति कुछ क्षण को मौन हो गया।
अग्निभूति थोड़ा ठहरते हुए बोला, "विश्वास करो, मेरा प्रेम शरीर का प्रेम नहीं, यह मन का प्रेम है, यह आत्मीय प्रेम है।" पर "वासना शरीर का धर्म है। उसे अपना धर्म निभाने दो।"
इस पर देवमति कह उठी, "यदि तुम मुझे मन से प्रेम करते हो तो ऐसी स्थिति में हम दूर रहकर भी प्रेम कर सकते हैं।" फिर तो विवाह की भी आवश्यकता न होगी।
बिल्कुल, "मैं अपने प्रेम को तन तक नहीं लाता। क्योंकि, वासना शरीर का धर्म है, मैं शरीर के संबंध में सतर्क हूँ।"
यह सुन देवमति कुछ सोच में पड़ गई, भारी मन से बोली, "एक बात कहूं?"
"कहो!"
पहले शपथ लो, "जो कहूं वो मानोगे"
"मैं अपनी शपथ लेकर कहता हूँ, तुम जो कहो..."
देवमति ने कहा, "तुम्हारा क्या अस्तित्व है?"
"जो तुम अपनी शपथ लेते हो।"
"तो मैं तुम्हारी शपथ लेता हूँ "
"मेरी शपथ क्यूँ ..."
"मैं और तुम दोनों नश्वर है।"
तो ठीक है, "मैं विधाता की शपथ लेता हूँ ।"
नहीं, विधाता की भी नहीं, "उनसे उत्पन्न प्रेम की सौगंध तुम्हें लेनी होगी।"
"दो से शुरू एक पर खत्म होने वाले प्रेम की सौगंध लो।"
ध्यान से सुनो!
"तुम्हारे और हमारे बीच उगने वाले राधा-कृष्ण जैसे आह्लादित प्रेम की शक्ति की सौगंध लो।"
यह देवमति का प्रस्ताव था। प्रस्ताव रख देवमति के क़दम चल पड़े।
अग्निभूति ने जिस प्रेम की शपथ लेने का वादा किया था, उस प्रेम में दिखने वाली हरियाली के बीच अद्वैत प्रेम का पुष्प उसे खिलता हुआ दिखने लगा था। उसे प्रेयसी देवमति में स्वयं के स्व से उपजी आह्लादिनी शक्ति के दर्शन हो गए थे। आत्मदर्शन से आत्मा अलग जान पड़ने लगी थी। अग्निभूति को अपना देह पके नारियल के खोल की तरह अलग दिखने लगा।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय
-काव्यस्यात्मा
#kaminimohan
#प्रेमकहानी
#प्रेम
#आत्मा
#राधाकृष्ण
#हिन्दी_साहित्य
Sahitya
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kaminimohan · 16 hours ago
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काव्यस्यात्मा 708
न किसी संदल का मंज़र न कोई पस-ए-मंज़र
ज़िंदगी बस है इक सफ़र
फ़िक्र-ओ-नज़र हो तो राब्ता-ए-इश्क़ से रू-ब-रू
दिखे हर हमसफ़र।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय
-काव्यस्यात्मा
(शब्दार्थ:)
#फ़िक्र-ओ-नज़र : दृष्टिकोण, अनुभूति
#रू-ब-रू : आमने-सामने
#राब्ता-ए-इश्क़ : प्रेम पूर्ण लगाव
#पस-ए-मंज़र : पृष्ठभूमि।
#मंज़र: दृश्य
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kaminimohan · 16 hours ago
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काव्यस्यात्मा 707
घटते प्राण की छाँह में आयु दुर्बल होती है,
तिमिर में फंसकर आत्मबल कमजोर होती है।
थकी वेदना मृत्यु पुकारती है,
देह की ऐंठन, टीस, चुभन नया चादर तलाशती है।
क्यों हम निन्दा करे देह के शूल की ?
जो चुभ रहा उस मूल की।
क्यों भूले उसके दिए आत्म को?
साँसों में गूँजते बाँसुरी के स्वर को!
अपने हृदयाकाश में रमते आत्म को?
देव की तरह विचारों के सभागार के सब सेवितों को?
कंटक मुक्त होते हम जिससे उस आत्मबल को?
सदा सुकुमार पुलकित आत्म से देह को मिले संबल,
हर पीड़ा की प्रेरणा से बढ़े प्राण का आवेशित बल।
हर क्षण शिव के लास्य व प्रलय का नृत्य देखो,
प्राण-रश्मियों के आत्मबल का सृजन देखो।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय
-काव्यस्यात्मा
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kaminimohan · 16 hours ago
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काव्यस्यात्मा 706
क़ाबिल-ए-दीद प्रकृति का हर मंज़र है,
सवाल-ए-दीद मुरली का हर स्वर है।
रुख़-ए-रौशन होता है वो हर धड़कन में
हसरत-ए-दीद की तिश्नगी अंदर है।
-© कामिनी मोहन पाण्डेय
-काव्यस्यात्मा (शब्दार्थ-)
क़ाबिल-ए-दीद: देखने लायक
सवाल-ए-दीद : देखने के लिए सवाल
तिश्नगी: प्यास
हसरत-ए-दीद:देखने की इच्छा
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#काव्यस्यात्मा
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its-all-down-hill · 16 hours ago
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