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#हिन्दीकविता
deepjams4 · 4 days ago
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deepjams4 · a month ago
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वो कोई! #वो #हिन्दीकविता #हिन्दी_साहित्य #हिन्दीशायरी #हिन्दी_काव्य_कोश #हिन्दीपंक्तियां #hindipoetry #hindipoems #hindipoems #hindipoetrycommunity #hindipoetsoninstagram #hindipoetsonig #writersofinstagram #writer #writing #writerscommunity #hindiwritersoninsta #hindiwritersonig #hindishayari https://www.instagram.com/p/COm4YI3lP8q/?igshid=k2nok6a1aykx
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ankitashambhawi · 8 months ago
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आज शाम जयश्री रॉय का एक उपन्यास 'इकबाल' पढ़ रही थी. एक प्रसंग आता है उसमें जब उपन्यास की protagonist 'जिया' पहली बार 'इकबाल' से मिलने कश्मीर जाती है. एयरपोर्ट के गेट के पास खड़ा होता है इकबाल हल्की नीली शर्ट और फेडेड जीन्स में ; उसे देखकर जया और साथ-साथ समय भी यकायक थम कर रुक जाते हैं, धूप में वो खड़ा होता है जड़ा-सा, उजला, भीड़ में होते हुए भी भीड़ से अलग. कुछ ऐसा ही लिखा है लेखिका ने उसके बारे में...
ये पढ़कर मुझे अपनी नैनीताल यात्रा याद हो आयी, जब मैं उत्तराखंड लोक सेवा आयोग की एक परीक्षा देने के सिलसिले में वहाँ गयी थी, परीक्षा हल्द्वानी में थी.
उन दिनों मुझे सोशल मीडिया पर एक दोस्त मिला था. उस वक़्त वो वहीं नैनीताल में ही था, उसने मेरे वहाँ जाने से बहुत पहले ही कहा था कि जब भी आना हो, बताना, मैं घूमा दूँगा यहाँ, और निश्चिंत रहना. मैं भी पहली ही बार मिलती उससे, तो सहजता पहली बार में ही नहीं आ जाती है. मैंने सोचा था टाल जाऊँगी, नहीं मिलूँगी उससे, पर सोचा हुआ कहाँ हो पाता है हर बार. मेरे साथ 2 दोस्त और भी थे. हमने हल्द्वानी में परीक्षा दी. फिर नैनीताल वाले उस दोस्त ने हमें एग्जाम सेंटर के बाहर ही रिसीव कर लिया, पहली बार मिले थे हम. सबकुछ नया था.
औपचारिकता में उसने हाथ मिलाना चाहा था लेकिन मेरे हाथ में उस वक़्त पेंसिल बैग और एडमिट कार्ड वगैरह था, तो मैं हाथ नहीं मिला सकी और यूँही हेलो बोल दिया. खली थी उसे वो बात, बाद में कहा भी उसने.
हम सब उसकी गाड़ी में पहाड़ी रास्तों से गुज़रते हुए एक गेस्ट हाउस आए थे, उसने पहले से ही हमारे रहने का प्रबंध करवा दिया था, हालाँकि मुझे अहसान लेने से चिढ़ है लेकिन उसने इंसिस्ट किया था, तो मान गयी थी. रास्ते भर मुझे मोशन सिकनेस की वजह से ख़ूब उल्टियाँ हुईं, तब उस दोस्त ने ही सम्भाला, मुझे उस वक़्त उसका ये अपनत्व भला लगा.
गेस्ट हाउस आने के बाद जब तक सामान अंदर रखा जा रहा था, हम बाहर ही लॉन में खड़े होकर बतियाने लगे थे, मेरे बाक़ी दोनों दोस्त भी साथ थे, उनके लिए मेरे नैनीताल वाले दोस्त से मिलना एकदम नया था, वे उसे नहीं जानते थे, न कभी बात हुई थी. फिर तो ख़ूब बातें शुरू हो गईं, चूँकि उसने पॉलिटिकल साइंस से मास्टर्स किया था तो राजनीति पर अचानक से बातें चल पड़ीं, मैं उसके ठीक सामने खड़ी थी, मेरे बाक़ी दोस्त उसके अगल-बगल, जो उसी की तरफ़ देखते हुए बातें कर रहे थे.
देखने में वो काफ़ी आकर्षक था, एक औसत कदकाठी का लड़का, धारियों वाली एक गहरी नीली शर्ट पहन रखी थी उसने और ठंड कम होने की वजह से एक कत्थई रंग का स्लीवलेस पुलोवर, ढीली-ढाली फेडेड जीन्स, और काले फ़्रेम के चश्मे में बिल्कुल एक सरकारी नौकरी वाला मानुष लग रहा था, बाल तो सुबह अच्छे से ही काढ़े होंगे उसने, पर दिन भर की दौड़-भाग के कारण उसके भूरे-सुनहरे बाल बिखर गए थे, थकान चेहरे पर साफ़ झलक रही थी.
उधर सूरज डूबने वाला था और दोपहर अपनी करवट बदलकर साँझ हो जाना चाहती थी. पहाड़ों से छनकर आती हुई धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी. रंग गोरा होने के कारण उसके गालों की ललाई उसे अलग किस्म का नूर दे रही थीं, वो थका हुआ ज़रूर था, पर बातें ख़त्म ही नहीं हो रही थीं उसकी, मेरे दोस्त भी काफ़ी दिलचस्पी से इस बातचीत में मशगूल थे.
मुझमें उसी पल उसके प्रति एक अजीब-सा सम्मोहन जाग उठा था. मैं चुपचाप खड़ी होकर उसे पूरी तन्मयता से सुन रही थी, सुन क्या रही थी, मेरी नज़रें उसके चेहरे की लकीरों को ग़ौर से पढ़ लेना चाहती थीं. धूप अचानक मेरी आँखों पर पड़ने लगी तो मेरा ध्यान टूटा, और मैंने चुपके से अपना फ़ोन निकालकर उसकी 1-2 तस्वीरें खींच लीं. मैंने जीवन में कभी ऐसा नहीं किया था, एक बार बुरा भी लगा, कि क्या ऐसे तस्वीरें लेना अपराध होगा ? फिर दूसरे ही पल सोचा कि क्या मालूम मैं इस यात्रा के बाद इस लड़के से कभी मिल भी पाऊँगी या नहीं! तो कम-से-कम एक याद के तौर पर मेरे फ़ोन में उसकी ये तस्वीरें तो रहेंगी... ये सोचकर मैंने फ़ोन बन्द करके वापिस अपने बैग में रख लिया.
सारा सामान गेस्ट हाउस में रखा जा चुका था, सूरज डूब गया और फिर हम सब अंदर चले आए, अपने-अपने कमरों में. 2 दिन रहे हमलोग वहाँ और जितना हो पाया घूम भी लिया. साथ की तस्वीरें लेने में हिचक हुई तो सिर्फ़ नज़ारों की तस्वीरें रख लीं. पहाड़ों की यादें अमूमन सुन्दर ही होती हैं, मुझे लगा था मेरी भी होंगी!
नैनीताल से वापिस आ गयी तो हममें रोज़ ही बातें होने लगीं, फ़ोन-कॉल्स, चैट्स, अनगिनत रतजगे और इन्हीं सबके बीच मेरा जीवन मानों अपने सबसे ख़ूबसूरत मोड़ पर ले आया था मुझे !
फिर एक दिन अचानक उसके एक दोस्त, जो हमारा म्यूच्यूअल फ्रेंड भी था, का कॉल आया और उसके बाद फ़ोन पर उसने जो कुछ भी कहा उसे सुनने के बाद मेरे अंदर बहुत कुछ दरक-सा गया, मैं वहीं फ़र्श पर बैठी रह गयी, आँखें पनीली हुईं और उस बेबसी में मैं वहीं नीचे लेट गयी और फूट-फूट कर रोने लगी !
फ़ोन दूसरी ओर से कट गया था...
घर जाते हुए एक बड़े ट्रक से टकरा गई थी उसकी कार, रास्ता सँकरा था, संतुलन बिगड़ने की वजह से गाड़ी खाई में गिर गई थी...
एकाएक मुझे उसका कत्थई पुलोवर और धूप में लाल हुआ उसका थका, उजला, प्यारा-सा चेहरा याद आने लगा, फ़ोन में उसकी वही चुपके से ली हुई महज़ 3 तस्वीरें रखी थीं बस, मैं अब उसे हमेशा के लिए खो चुकी थी.
नैनीताल में ऊँचाई पर चढ़ते हुए उसका मेरी पीठ पर सहारा देना याद आ गया ... नज़रें धुँधला गईं. कभी नहीं सोचा था कि वो उसके साथ की अंतिम स्मृति होगी.
पहाड़ों की यादें हमेशा सुन्दर नहीं रह पातीं.
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~ ankita shambhawi
4:34 a.m.
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writeinkjunction · 10 months ago
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जो मन बेचैन था सुबह से सब के बीच वो छत पर जाते ही आसमान और तारो को देखकर शांत सा था।
सब ठीक होगा हौसला रख ये चलती हवा ने कहा सा था।।
Subhashini Barthwal @Writeful_soul
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